सिंधुदुर्ग ज़िले के एक छोटे-से गाँव में, नारियल और सुपारी के बागों के बीच, लाल मिट्टी के रास्ते के किनारे एक विशाल पीपल खड़ा है। उसकी जड़ें एक पुराने, सूखे कुएँ की मुंडेर को ऐसे जकड़े हुए हैं जैसे किसी ने उसे सौ साल से गले लगा रखा हो। गाँव वाले उस पेड़ के नीचे से गुज़रते हैं तो एक पल रुककर हाथ जोड़ते हैं, और धीरे से कहते हैं — “मुंज्या, रस्ता दे।”
कोंकण की लोककथाओं में मुंज्या उस ब्राह्मण बालक की आत्मा को कहते हैं, जिसका जनेऊ संस्कार (मुंज) तो हुआ, पर जो जीवन के अगले पड़ाव से पहले ही चल बसा। कहा जाता है कि वह पीपल पर रहता है — शरारती, जल्दी नाराज़ होने वाला, पर उतना ही मासूम भी।
पुणे से आया पोता
सिद्धेश देसाई पुणे में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर था। दादी के गुज़रने के बाद गाँव की पुश्तैनी ज़मीन उसके नाम आई — दो एकड़ का बाग़, पुराना कौलारू घर, और वह पीपल। एक रिसॉर्ट कंपनी ने अच्छी क़ीमत की पेशकश की थी, बस शर्त यह थी कि पेड़ और कुआँ हटाकर वहाँ स्विमिंग पूल बनेगा।
“पेड़ ही तो है,” सिद्धेश ने फ़ोन पर एजेंट से कहा, “अगले हफ़्ते आकर सौदा पक्का कर लेते हैं।”
गाँव पहुँचकर पहली शाम वह बाग़ में घूम रहा था, तभी उसके सिर पर एक कच्चा आम आकर लगा। उसने ऊपर देखा। पीपल की एक मोटी डाल पर दस-बारह साल का एक लड़का बैठा था — सिर मुँडा हुआ, पीछे एक छोटी-सी चोटी, कंधे पर सफ़ेद जनेऊ, और कमर पर सिर्फ़ एक धोती। वह पैर झुलाते हुए हँस रहा था।
“अरे! नीचे आ! गिर जाएगा!” सिद्धेश ने कहा।
लड़का और ज़ोर से हँसा, फिर पत्तों में ग़ायब हो गया। सिद्धेश ने चारों ओर देखा — पेड़ के नीचे शाम की लंबी परछाइयाँ थीं, पर उस डाल के नीचे, जहाँ लड़का बैठा था, कोई परछाईं नहीं पड़ी थी।
शरारतें
उसके बाद अजीब चीज़ें होने लगीं। सिद्धेश के जूते सुबह कुएँ की मुंडेर पर रखे मिलते। लैपटॉप का चार्जर पीपल की सबसे ऊँची डाल पर लटका मिलता। रात को घर की खपरैल पर कोई ऐसे दौड़ता जैसे छत पर कबड्डी चल रही हो। और जब रिसॉर्ट वाला एजेंट नक्शा लेकर आया, तो बिना हवा के उसका नक्शा उड़कर सूखे कुएँ में जा गिरा।
गाँव की बूढ़ी काकू, जो दादी की सहेली थीं, सिद्धेश की हालत देखकर मुस्कुराईं। “बाळू नाराज़ है।”
“कौन बाळू?”
काकू ने चाय का गिलास नीचे रखा। “तेरे दादा का छोटा भाई। बालकृष्ण। तेरी दादी उसे बहुत याद करती थी। उसका मुंज हुआ ही था — ग्यारह साल का था। उसी साल गर्मियों में वह इसी कुएँ से पानी निकालने गया और फिसल गया। तब से कुआँ सूख गया, और पीपल पर बाळू रहने लगा। तेरी दादी हर अमावस को पेड़ के नीचे दूध-भात रखती थी, और कहती थी — बाळू, घर की रखवाली कर। उसने हमेशा की।”
“तो अब?”
“अब तू उसका घर बेच रहा है, बेटा। बच्चा है — रूठेगा नहीं तो क्या करेगा?”
अमावस की रात
सिद्धेश को यह सब कहानी लगती थी। पर सौदे से एक रात पहले, अमावस की रात, उसे नींद नहीं आई। आधी रात को उसने आँगन में किसी के रोने की आवाज़ सुनी — किसी बच्चे की सिसकियाँ, धीमी और लगातार।
वह टॉर्च लेकर बाहर निकला। पीपल के नीचे, सूखे कुएँ की मुंडेर पर, वही लड़का बैठा था। इस बार वह हँस नहीं रहा था। उसकी धोती गीली थी, और उससे लगातार पानी टपक रहा था — एक सूखे कुएँ के किनारे, जहाँ पचास साल से पानी नहीं था।
“तू मेरा पीपल काटेगा?” लड़के ने बिना देखे पूछा। उसकी आवाज़ कुएँ की गहराई से आती लग रही थी।
सिद्धेश ने हिम्मत जुटाई। “बाळू काका?”
लड़के ने चौंककर सिर उठाया। किसी ने शायद सत्तर साल में पहली बार उसे इस नाम से पुकारा था, ऐसे — “काका” कहकर, रिश्ते से।
“आई (माँ) मुझे यही कहती थी,” उसने धीरे से कहा, “बाळू। सब मुंज्या कहते हैं, डरते हैं। सिर्फ़ तेरी आजी (दादी) डरती नहीं थी। वह मुझे दूध-भात देती थी और कहानियाँ सुनाती थी। अब वह भी चली गई।” उसकी आँखों में ऐसा अकेलापन था जो किसी बच्चे की आँखों में नहीं होना चाहिए।
“मुझे नहीं पता था,” सिद्धेश ने कहा। और यह सच था। पुणे के फ़्लैट में बैठकर उसने कभी नहीं सोचा था कि इस ज़मीन पर कोई उसका इंतज़ार कर रहा है।
सौदा रद्द
सुबह एजेंट और रिसॉर्ट के मालिक कागज़ लेकर आए। सिद्धेश ने चाय पिलाई, और फिर कहा, “माफ़ कीजिए, सौदा नहीं होगा।”
रिसॉर्ट मालिक भड़क गया। “क़ीमत बढ़ा देते हैं! पेड़ के लिए कोई इतना पैसा नहीं छोड़ता!” वह ग़ुस्से में पीपल की ओर बढ़ा, जैसे दिखाना चाहता हो कि यह बस एक पेड़ है। उसी पल ऊपर से एक भारी सूखी डाल टूटकर ठीक उसके सामने गिरी — एक इंच का फ़ासला। और पत्तों के बीच से किसी बच्चे की खिलखिलाहट गूँजी।
रिसॉर्ट वाले उस दिन के बाद गाँव नहीं लौटे।
दूध-भात
सिद्धेश ने नौकरी “वर्क फ़्रॉम होम” में बदलवा ली। उसने पुराने घर की मरम्मत करवाई और बाग़ में नारियल-सुपारी के नए पौधे लगवाए। गाँव के लोगों की मदद से उसने सूखे कुएँ की सफ़ाई करवाई — और हैरानी की बात, पहली ही बारिश में कुएँ में फिर से पानी आ गया।
अब हर अमावस को पीपल के नीचे एक केले के पत्ते पर दूध-भात रखा जाता है, और सिद्धेश वहाँ बैठकर दादी की सुनाई कहानियाँ ज़ोर से पढ़ता है। सुबह पत्ता ख़ाली मिलता है।
कभी-कभी उसके जूते अब भी कुएँ की मुंडेर पर मिलते हैं, और लैपटॉप का चार्जर किसी डाल पर लटका होता है। सिद्धेश हँसकर ऊपर देखता है और कहता है, “बाळू काका, ऑफ़िस की मीटिंग है, चार्जर दे दो!” और पत्तों में एक सरसराहट होती है, जैसे कोई बच्चा शरारत पर पकड़े जाने के बाद मुस्कुरा रहा हो।
गाँव वाले अब भी पीपल के नीचे से गुज़रते हुए हाथ जोड़ते हैं। पर अब वे “मुंज्या, रस्ता दे” नहीं कहते। वे कहते हैं — “बाळू, घर संभालना।”
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नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।




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