समुद्र तल से सत्रह हज़ार फ़ुट की ऊँचाई पर, लद्दाख की एक अग्रिम चौकी — जिसे जवान बस “पोस्ट सात” कहते थे। जनवरी में यहाँ तापमान शून्य से चालीस डिग्री नीचे चला जाता है। हवा इतनी पतली कि दस क़दम चलने पर साँस फूल जाए, और रात इतनी लंबी कि लगे सुबह कभी होगी ही नहीं।
सिपाही विक्रम राठी को पोस्ट सात पर आए दो महीने हुए थे। हरियाणा के एक गाँव का लड़का, जिसने बर्फ़ पहली बार यहीं आकर देखी थी। उसके साथ रात की संतरी ड्यूटी पर था नायक तेनज़िन — लद्दाख का ही रहने वाला, शांत, अनुभवी, और पहाड़ों की हर आवाज़ पहचानने वाला।
तूफ़ान की रात
उस रात बर्फ़ीला तूफ़ान आया। हवा चीख़ रही थी, बर्फ़ के कण गोलियों की तरह चेहरे पर लग रहे थे, और नाइट-विज़न में भी दस मीटर से आगे कुछ नहीं दिखता था। विक्रम और तेनज़िन बंकर के पास वाली खाई में खड़े थे, एक-दूसरे से सटे हुए।
रात दो बजे विक्रम ने कोहनी मारी। “उस्ताद, वहाँ कोई है।”
खाई के दूसरे सिरे पर, बर्फ़ की धुंध में, एक आकृति खड़ी थी। राइफ़ल कंधे पर, चेहरा पहाड़ों की ओर। ड्यूटी पर तीसरा कोई नहीं होना चाहिए था।
“हॉल्ट! कौन है?” विक्रम ने राइफ़ल तानी।
आकृति ने धीरे से मुड़कर देखा। नाइट-विज़न की हरी रोशनी में विक्रम ने जो देखा, उससे उसकी उँगली ट्रिगर पर जम गई। वह एक जवान था — पर उसकी वर्दी पुराने ज़माने की थी। ऊनी जर्सी, मोटा ग्रेटकोट, सिर पर गोल टोपी, और कंधे पर लकड़ी के कुंदे वाली पुरानी .303 राइफ़ल। ऐसी राइफ़ल विक्रम ने सिर्फ़ रेजिमेंट के संग्रहालय में देखी थी।
“पासवर्ड?” तेनज़िन ने शांत आवाज़ में पूछा।
अजनबी ने कोई पासवर्ड नहीं बताया। उसने सिर्फ़ पहाड़ के ऊपर की ओर इशारा किया, और कहा — “ऊपर की बर्फ़ बोल रही है। यहाँ से हटो। अभी।”
बर्फ़ की आवाज़
विक्रम ने तेनज़िन की ओर देखा। “उस्ताद, यह कौन है? हमारी यूनिट का तो नहीं…”
पर तेनज़िन का चेहरा बदल गया था। उसने कान लगाकर सुना। हवा के शोर के नीचे, बहुत गहराई से, एक धीमी गड़गड़ाहट आ रही थी — जैसे पहाड़ के पेट में कोई कराह रहा हो।
“एवलांच,” तेनज़िन फुसफुसाया। “चलो! पुराने बंकर की तरफ़!”
अजनबी पहले ही आगे चल पड़ा था। वह बर्फ़ में ऐसे चल रहा था जैसे उसका वज़न ही न हो — उसके पैरों के निशान नहीं बन रहे थे। विक्रम और तेनज़िन उसके पीछे भागे। उसने उन्हें चट्टानों के बीच से एक ऐसे रास्ते से निकाला जो विक्रम ने पहले कभी नहीं देखा था, और एक पुराने, आधे दबे पत्थर के बंकर तक ले गया।
वे जैसे ही भीतर घुसे, पीछे पूरा पहाड़ जैसे टूट पड़ा। गड़गड़ाहट इतनी तेज़ थी कि ज़मीन काँप उठी। बर्फ़ की एक विशाल दीवार उस खाई पर से गुज़री जहाँ वे पाँच मिनट पहले खड़े थे, और उसे पूरी तरह निगल गई।
बंकर में बातचीत
पुराने बंकर में अँधेरा था। विक्रम ने काँपते हाथों से टॉर्च जलाई। अजनबी दरवाज़े के पास खड़ा था, बाहर देखता हुआ। टॉर्च की रोशनी उसके शरीर से होकर दीवार पर पड़ रही थी।
“आप… आप कौन हैं?” विक्रम ने पूछा।
“सिपाही हरदयाल सिंह,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब-सा गर्व था। “पोस्ट सात। नवंबर, बासठ।”
तेनज़िन ने धीरे से अपनी टोपी उतारी और सीधा खड़ा हो गया। विक्रम ने भी, बिना समझे, वही किया।
“उस रात भी ऐसा ही तूफ़ान था,” हरदयाल ने कहा। “हम चार थे। लड़ाई के बीच बर्फ़ का पहाड़ गिरा। तीन को मैंने इसी बंकर तक पहुँचाया। चौथी बार लौटा तो…” वह रुक गया। “मुझे कभी किसी ने ढूँढ़ा नहीं। बर्फ़ के नीचे ही रह गया। तब से ड्यूटी नहीं छूटी।”
“घर?” तेनज़िन ने धीरे से पूछा। “घर पर कोई है?”
हरदयाल ने पहली बार मुस्कुराकर देखा। “एक छोटी बहन थी। रानो। जाते वक़्त कहा था, राखी पर आऊँगा।”
सुबह की खोज
सुबह तूफ़ान थमा। बचाव दल को दोनों जवान पुराने बंकर में ज़िंदा मिले। हरदयाल का कहीं पता नहीं था। जब विक्रम ने कंपनी कमांडर को पूरी बात बताई, तो उन्होंने पहले उसे अजीब नज़रों से देखा — पर तेनज़िन की गवाही के बाद उन्होंने रेजिमेंट के पुराने रिकॉर्ड मँगवाए।
रिकॉर्ड में नाम था: सिपाही हरदयाल सिंह, नवंबर 1962, पोस्ट सात — “लापता, संभवतः हिमस्खलन में शहीद।”
उस गर्मी में, जब बर्फ़ कुछ पिघली, एवलांच वाले इलाक़े की तलाशी के दौरान विक्रम को पुराने बंकर से कुछ मीटर दूर चट्टानों के बीच एक चीज़ चमकती दिखी। एक जंग लगी धातु की पहचान-पट्टी — आइडेंटिटी डिस्क। उस पर खुदा था एक नंबर और एक नाम: हरदयाल सिंह।
राखी
अगस्त में, छुट्टी मिलते ही, विक्रम हिमाचल के एक दूर-दराज़ गाँव पहुँचा। रेजिमेंट ने हरदयाल के परिवार का पता ढूँढ़ निकाला था। एक पुराने घर के आँगन में अस्सी साल से ऊपर की एक बूढ़ी औरत धूप में बैठी थी। रानो।
विक्रम ने उनके हाथ में वह पहचान-पट्टी रखी, और पूरी कहानी सुनाई — तूफ़ान, बर्फ़, और उस संतरी की जिसने बासठ साल बाद भी ड्यूटी नहीं छोड़ी।
रानो बहुत देर तक पट्टी को सीने से लगाए रोती रहीं। फिर उन्होंने एक पुराना टीन का डिब्बा खोला। उसमें बासठ राखियाँ थीं — हर साल की एक, जो उन्होंने बनाई थीं पर बाँध नहीं पाई थीं।
“मैं जानती थी वह लौटेगा,” उन्होंने कहा। “बस यह नहीं जानती थी कि किसी और के हाथ भेजेगा।”
उस रक्षाबंधन पर रानो ने विक्रम की कलाई पर राखी बाँधी। और सर्दियों में जब विक्रम वापस पोस्ट सात पहुँचा, तो उसने पुराने बंकर के दरवाज़े पर एक राखी बाँध दी।
जवान कहते हैं कि उसके बाद पोस्ट सात पर कोई अजनबी संतरी नहीं दिखा। पर तूफ़ानी रातों में, जब बर्फ़ बोलने लगती है, किसी-किसी को हवा में एक आवाज़ सुनाई देती है — “यहाँ से हटो। अभी।” और पोस्ट सात पर उस आवाज़ को कोई अनसुना नहीं करता।
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नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।



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