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निशि डाक: आधी रात की पुकार

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सुंदरबन के मैंग्रोव जंगल में आधी रात को नाव पर लालटेन लिए शिक्षक और कोहरे में पुकारती परछाईं

सुंदरबन के दक्षिणी छोर पर, जहाँ नदियाँ समंदर में घुलने से पहले सौ रास्तों में बँट जाती हैं, चरघेरी नाम का एक छोटा-सा द्वीप है। मिट्टी के घर, ताड़ के पेड़, चारों तरफ़ खारे पानी की नहरें, और उनके पार मैंग्रोव का घना, अँधेरा जंगल — जहाँ बाघ भी रहते हैं और कुछ ऐसी चीज़ें भी, जिनका नाम लोग रात को नहीं लेते।

अनिर्बान घोष शहर से आया एक युवा शिक्षक था, जिसे द्वीप के इकलौते प्राइमरी स्कूल में दो साल की पोस्टिंग मिली थी। पहले ही दिन नाव से उतारते हुए बूढ़े मल्लाह जोगेन दा ने उससे कहा था, “मास्टर बाबू, एक बात गाँठ बाँध लो। रात को अगर कोई तुम्हारा नाम पुकारे — चाहे आवाज़ कितनी भी अपनी लगे — तीसरी बार से पहले जवाब मत देना। निशि दो बार ही बुलाती है।”

तुम्पा का सवाल

स्कूल में अनिर्बान की सबसे होशियार छात्रा थी आठ साल की तुम्पा। पर पिछले कुछ दिनों से वह चुप-चुप रहती थी। एक दिन छुट्टी के बाद वह रुक गई।

“मास्टर मोशाय, क्या मरे हुए लोग बुलाते हैं?”

अनिर्बान ने उसके पास बैठकर पूछा कि बात क्या है। तुम्पा ने बताया कि दस दिन पहले उसके बाबा, कालीपद, आधी रात को किसी की पुकार सुनकर घर से निकले थे। “बाबा ने कहा, ठाकुमा (दादी) बुला रही है। पर ठाकुमा तो दो साल पहले मर गई थीं।” उस रात के बाद कालीपद लौटे नहीं। गाँव वालों ने नहरों में, जंगल के किनारे, सब जगह ढूँढ़ा। फिर मान लिया कि निशि ले गई — या बाघ।

“माँ रोती है,” तुम्पा ने कहा, “पर मुझे लगता है बाबा कहीं हैं।”

पहली पुकार

उस रात बारिश थमी ही थी कि अनिर्बान की नींद खुली। उसके कमरे की खिड़की के बाहर, अँधेरे में, किसी ने पुकारा —

“अनिर्बान…”

वह बिस्तर पर जम गया। आवाज़ उसकी माँ की थी। वही नरमी, वही खिंचाव, वही थकान जो माँ की आवाज़ में आख़िरी दिनों में आ गई थी। माँ को गुज़रे पाँच साल हो चुके थे।

“अनिर्बान… बाहर आ, बेटा। देख, मैं आई हूँ।”

उसका दिल चाहा कि दौड़कर दरवाज़ा खोल दे। पाँच साल से वह इस आवाज़ को सुनने के लिए तरसा था। उसके होंठ हिले — “माँ…” — पर तभी उसे जोगेन दा की बात याद आई। उसने दाँत भींचकर मुँह बंद रखा।

आवाज़ दूसरी बार आई, इस बार थोड़ी दूर से, नहर की तरफ़ से। “अनिर्बान…”

फिर ख़ामोशी। तीसरी पुकार नहीं आई।

उसके बाद अनिर्बान रात भर जागता रहा। सुबह होने पर एक बात उसके दिमाग़ में बार-बार लौट रही थी — उसकी माँ ने उसे ज़िंदगी में कभी “अनिर्बान” कहकर नहीं बुलाया था। माँ उसे “बुबाई” कहती थी। हमेशा।

आवाज़ की नक़ल

सुबह उसने जोगेन दा को सब बताया। बूढ़े मल्लाह ने सिर हिलाया। “निशि तुम्हारे मन से आवाज़ चुराती है, मास्टर बाबू, पर पूरा मन नहीं पढ़ पाती। वह वही नाम पुकारती है जो सबको पता हो। जिसने प्यार से रखा नाम सुना हो, वह बच जाता है — अगर ध्यान दे।”

“कालीपद ने ध्यान नहीं दिया,” अनिर्बान ने कहा।

“कालीपद की माँ उसे कालू बुलाती थी,” जोगेन दा ने धीरे से कहा। “पर दुख में आदमी फ़र्क़ नहीं पहचानता।”

“निशि जिसे बुलाती है, उसे कहाँ ले जाती है?”

जोगेन दा ने नहर के उस पार, जंगल की तरफ़ इशारा किया। “पानी की ओर। हमेशा पानी की ओर। लोग कहते हैं वह किसी को मारती नहीं — बस रास्ता भुला देती है। ज्वार के बीच किसी ऐसी जगह छोड़ देती है जहाँ से लौटने का रास्ता नहीं दिखता।”

अनिर्बान के दिमाग़ में तुम्पा की बात गूँजी — “मुझे लगता है बाबा कहीं हैं।”

आवाज़ के पीछे

उस रात अनिर्बान जागता रहा, पर इस बार डर के साथ नहीं, तैयारी के साथ। उसके पास टॉर्च थी, जोगेन दा की छोटी डिंगी नाव बाहर बँधी थी, और जोगेन दा ख़ुद पतवार थामे बैठे थे।

आधी रात को पुकार आई। “अनिर्बान…”

उसने जवाब नहीं दिया। पर वह उठा, और आवाज़ की दिशा में चल पड़ा — नहर की ओर। दूसरी पुकार नहर के उस पार से आई। जोगेन दा ने नाव खोली। अनिर्बान ने टॉर्च सिर्फ़ पानी पर रखी, पेड़ों पर नहीं। “उसे देखना मत,” जोगेन दा ने फुसफुसाकर कहा था, “बस सुनना। निशि जिस तरफ़ ले जाती है, वहाँ उसके पहले शिकार होते हैं।”

नाव संकरी नहरों में घुसती गई। मैंग्रोव की जड़ें पानी से ऐसे निकली थीं जैसे हज़ारों उँगलियाँ। हवा में कीचड़ और नमक की गंध थी। आवाज़ फिर नहीं आई, पर अब अनिर्बान ने कुछ और सुना — बहुत कमज़ोर, बहुत दूर से, एक आदमी की कराह।

“कालीपद!” जोगेन दा चिल्लाए।

“यहाँ… यहाँ…”

नहर के बीच, जहाँ ज्वार उतरने पर कीचड़ का एक छोटा-सा टापू (चर) उभर आता था, कालीपद पड़ा था। दस दिन से। बुखार में तपता, दुबला, पैर में मोच — पर ज़िंदा। उसने बताया कि हर दिन ज्वार आता था और वह एक पेड़ पर चढ़कर बचता था। बरसात का पानी पीकर, केकड़े खाकर, उसने दस दिन काटे थे। और हर रात कोई उसे पुकारता था, ताकि वह पेड़ से उतरकर पानी में जाए।

तीसरी पुकार

जब नाव कालीपद को लेकर लौट रही थी, अँधेरे जंगल से आख़िरी बार एक आवाज़ आई। इस बार किसी की माँ की नहीं, किसी अपने की नहीं — एक खोखली, गीली आवाज़, जैसे कीचड़ के भीतर से कोई बोल रहा हो।

“अनिर्बान…”

अनिर्बान ने टॉर्च बंद की, आँखें बंद कीं, और पहली बार ज़ोर से जवाब दिया — पर अपने नाम से नहीं।

“मुझे बुबाई कहते हैं। और तुम मेरी माँ नहीं हो।”

जंगल में एक लंबी साँस जैसी सरसराहट हुई, जैसे बहुत सारे पत्ते एक साथ हिले हों। फिर सन्नाटा।

कालीपद ठीक हो गया। तुम्पा अब फिर से कक्षा में सबसे पहले हाथ उठाती है। और चरघेरी के स्कूल में अनिर्बान ने एक नया नियम शुरू किया है — हर बच्चा अपने घर का प्यार से रखा नाम सिर्फ़ अपने परिवार के साथ बाँटता है, और किसी को नहीं बताता।

बच्चे इसे खेल समझते हैं। गाँव के बूढ़े मुस्कुराकर सिर हिलाते हैं। और रात को, जब नहरों के पार से कोई नाम पुकारता है, तो चरघेरी में अब कोई दरवाज़ा नहीं खुलता — जब तक पुकारने वाला सही नाम न ले।

नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।

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