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पुस्तकालय का ब्रह्मराक्षस

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पहाड़ी स्कूल के पुस्तकालय में दीया लिए छात्र और अलमारियों के बीच तैरता ब्रह्मराक्षस

हिमाचल की चीड़ से ढकी पहाड़ियों में बसे चीड़गढ़ कस्बे का देवधार आवासीय विद्यालय अंग्रेज़ों के ज़माने का है। पत्थर की मोटी दीवारें, लकड़ी की सीढ़ियाँ जो हर क़दम पर कराहती हैं, और पूर्वी विंग के आख़िर में एक पुस्तकालय, जिसके दरवाज़े पर पीतल का पुराना ताला लटका रहता है। छात्रों के बीच एक नियम पीढ़ियों से चलता आया था — सूरज ढलने के बाद पुस्तकालय की तरफ़ मत जाना।

ग्यारहवीं में पढ़ने वाला आरव नेगी इन बातों पर हँसता था। वह गाँव से आया था, पढ़ाई में औसत था, पर उसकी जिज्ञासा का कोई अंत नहीं था। उसे नहीं पता था कि दिसंबर की वह ठिठुरती रात उसकी ज़िंदगी का सबसे लंबा सवाल लेकर आने वाली है।

पीतल के ताले के पीछे

अर्धवार्षिक परीक्षा से पहले नए प्रधानाचार्य मल्होत्रा सर ने घोषणा की कि पुस्तकालय की “बेकार पड़ी पुरानी किताबें” हटाई जाएँगी ताकि वहाँ कंप्यूटर लैब बन सके। उसी हफ़्ते स्कूल में एक चमचमाती गाड़ी आई। उसमें से उतरे आदमी ने ख़ुद को “पुरानी किताबों का व्यापारी” बताया। आरव ने उसे प्रधानाचार्य के साथ पुस्तकालय की ओर जाते देखा था — और लौटते वक़्त दोनों के चेहरे पर एक अजीब-सी ख़ुशी थी।

बूढ़े चपरासी बिशन दा ने उसी शाम चाय पीते हुए धीरे से कहा, “बेटा, उस कमरे में सिर्फ़ किताबें नहीं हैं। वहाँ शास्त्री जी रहते हैं।”

“कौन शास्त्री जी?” आरव ने पूछा।

बिशन दा ने आग की ओर देखते हुए बताया कि सौ साल पहले पंडित विश्वंभर शास्त्री इस स्कूल में संस्कृत पढ़ाते थे। वे बहुत बड़े विद्वान थे, पर उतने ही घमंडी भी। वे पहाड़ के गाँवों से इकट्ठी की गई हस्तलिखित पांडुलिपियों पर टीका लिख रहे थे — जड़ी-बूटियों, नक्षत्रों और लोकगीतों का ऐसा ख़ज़ाना जो कहीं और नहीं था। एक रात लालटेन गिरी, आग लगी, और शास्त्री जी अपनी अधूरी टीका बचाते हुए उसी कमरे में चल बसे। “लोग कहते हैं,” बिशन दा बोले, “विद्वान ब्राह्मण अगर अपना ज्ञान अधूरा छोड़कर और अहंकार के साथ मरे, तो ब्रह्मराक्षस बनता है। वह ज्ञान की रखवाली करता है और हर आने वाले से सवाल पूछता है।”

आधी रात का पहला सवाल

उस रात आरव को नींद नहीं आई। हॉस्टल की खिड़की से उसने देखा — पूर्वी विंग में पुस्तकालय की खिड़की के पीछे पीली रोशनी टिमटिमा रही थी, जैसे किसी ने दीया जलाया हो। फिर उसने दो परछाइयाँ देखीं, टॉर्च लिए हुए। प्रधानाचार्य और वह व्यापारी।

जिज्ञासा डर से बड़ी निकली। आरव ने शॉल ओढ़ी और दबे पाँव गलियारे में निकल पड़ा। पुस्तकालय का दरवाज़ा आधा खुला था। भीतर हवा अजीब तरह से गर्म थी, और पुराने काग़ज़ और चंदन की गंध से भरी थी। अलमारियों के बीच व्यापारी एक लकड़ी के संदूक में बँधी पांडुलिपियाँ भर रहा था।

तभी सारी टॉर्चें एक साथ बुझ गईं।

अँधेरे में किसी ने पन्ना पलटा। फिर एक गहरी, खरखराती आवाज़ गूँजी — “जो ले जा रहा है, वह उत्तर दे। बताओ, वह कौन-सा धन है जो बाँटने से बढ़ता है और छिपाने से सड़ जाता है?”

व्यापारी ने घबराकर हँसने की कोशिश की। “कौन है? मज़ाक बंद करो!” उसने माचिस जलाई। उस छोटी-सी लौ में आरव ने देखा — छत तक लंबी एक आकृति, जिसके शरीर पर जली हुई धोती थी, सिर पर चोटी, और आँखों में अंगारों जैसी लाल चमक। उसकी उँगलियाँ इतनी लंबी थीं कि अलमारियों के पार तक पहुँचती थीं।

“सोना!” व्यापारी चिल्लाया, “सोना बाँटने से नहीं बढ़ता, पर… पैसा! निवेश से पैसा बढ़ता है!”

ब्रह्मराक्षस ठहाका मारकर हँसा। उस हँसी से खिड़कियों के शीशे झनझना उठे। अगले ही पल व्यापारी हवा में उछला और धूल भरे फ़र्श पर जा गिरा। संदूक की पांडुलिपियाँ अपने-आप उड़कर वापस अलमारियों में जा बैठीं।

प्रधानाचार्य की बारी

मल्होत्रा सर पीछे हटते हुए दीवार से जा टकराए। उनकी साँस फूल रही थी। ब्रह्मराक्षस धीरे-धीरे उनकी ओर झुका। “तुम शिक्षक हो,” उसने कहा, और इस बार आवाज़ में घृणा थी, “तुम्हें तो उत्तर पता होना चाहिए।”

“मैं… मैं एम.बी.ए. हूँ,” प्रधानाचार्य हकलाए, “मैंने कभी संस्कृत नहीं पढ़ी, ये किताबें किसी काम की नहीं थीं, मैं तो बस स्कूल के लिए पैसे…” वे बात पूरी न कर सके। अदृश्य हाथों ने उन्हें कुर्सी पर बिठा दिया, और कुर्सी ऐसे जकड़ गई जैसे उसकी लकड़ी में जड़ें निकल आई हों।

अब अंगारों जैसी आँखें दरवाज़े की ओर मुड़ीं — जहाँ आरव खड़ा था।

“और तुम, बालक? तुम भी कुछ लेने आए हो?”

आरव के घुटने काँप रहे थे। उसके दिमाग़ में सौ जवाब दौड़ रहे थे — किताबों में पढ़ी पंक्तियाँ, दादी की कहावतें। पर उसे सच में नहीं पता था कि सही उत्तर क्या है। उसने गहरी साँस ली और वही कहा जो सच था।

“मुझे नहीं पता, शास्त्री जी। मैं कुछ लेने नहीं, देखने आया था कि कोई इन किताबों को चुरा न ले। अगर आप बताएँगे, तो मैं सीखूँगा।”

अधूरी टीका

कमरे में लंबा सन्नाटा छा गया। फिर आकृति सिकुड़ने लगी। लाल आँखों की चमक मद्धम पड़ी, और आरव के सामने एक दुबला-पतला बूढ़ा आदमी खड़ा था, जले हुए किनारों वाली पोथी हाथ में लिए।

“सौ बरस,” शास्त्री जी की आवाज़ अब थकी हुई थी, “सौ बरस से हर आने वाले से यही पूछ रहा हूँ। सबने उत्तर देने की कोशिश की — कोई धन बताता, कोई कीर्ति। किसी ने यह नहीं कहा कि उसे नहीं पता। मैं भी नहीं कह पाया था, बालक। मैंने अपना ज्ञान किसी को नहीं सिखाया, क्योंकि मुझे डर था कि कोई मुझसे बड़ा हो जाएगा। इसीलिए मेरी टीका अधूरी रह गई — और मैं यहीं अटक गया।”

उन्होंने पोथी आरव की ओर बढ़ाई। “उत्तर है — विद्या। वह बाँटने से बढ़ती है और छिपाने से सड़ जाती है। ये पांडुलिपियाँ पहाड़ के लोगों की हैं। इन्हें बेचा नहीं, बाँटा जाना चाहिए।”

आरव ने काँपते हाथों से पोथी थामी। उसके जले हुए पन्ने छूते ही गर्म लगे, जैसे उनमें अब भी किसी की साँसें बाक़ी हों।

सुबह की धूप

सुबह बिशन दा ने पुस्तकालय का दरवाज़ा खुला पाया। व्यापारी गायब था — बाद में पता चला कि वह रातोंरात कस्बा छोड़कर भाग गया। प्रधानाचार्य मल्होत्रा कुर्सी पर बेहोश मिले, और होश आने पर उन्होंने एक ही बात कही — “पुस्तकालय नहीं हटेगा।”

कुछ महीनों बाद शिमला के एक विश्वविद्यालय की टीम आई और उन पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में सहेजने का काम शुरू हुआ। उनमें चीड़गढ़ के आसपास की ऐसी जड़ी-बूटियों का ज़िक्र था जिन्हें लोग भूल चुके थे, और ऐसे लोकगीत जो अब किसी को याद नहीं थे।

आरव ने संस्कृत को वैकल्पिक विषय के रूप में चुना। अब वह हर शाम पुस्तकालय में बैठकर पढ़ता है, और जूनियर बच्चों को भी बुलाता है। कभी-कभी, जब वह किसी कठिन श्लोक पर अटकता है, तो उसे लगता है कि पीछे की अलमारी से कोई धीरे से पन्ना पलटता है — और कठिन शब्द के पास हल्की-सी चंदन की गंध फैल जाती है।

स्कूल के बच्चे अब भी कहते हैं कि सूरज ढलने के बाद पुस्तकालय मत जाना। पर आरव जानता है — वहाँ जाने से डरना नहीं चाहिए, बस इतना याद रखना चाहिए कि जो नहीं आता, उसे स्वीकार करना ही सीखने की पहली सीढ़ी है।

नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।

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