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चाय बागान की आख़िरी पत्ती

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धुंध भरे चाय बागान में पीठ पर टोकरी लिए उल्टे पैरों वाली चुड़ैल और डरी हुई युवा मज़दूर

उत्तर बंगाल के डुआर्स इलाक़े में, भूटान की पहाड़ियों की तलहटी पर, मेघझोरा चाय बागान फैला हुआ है। दूर तक हरी-भरी झाड़ियों की कतारें, बीच-बीच में छायादार सिल्वर ओक के पेड़, और सुबह-शाम उतरती घनी धुंध जो पूरे बागान को सफ़ेद चादर में लपेट देती है।

यहाँ की औरतें पीढ़ियों से पत्ती तोड़ती आई हैं — “दो पत्ती, एक कली”। पीठ पर बाँस की टोकरी, माथे पर उसकी पट्टी, और उँगलियाँ इतनी तेज़ कि आँख झपकते ही मुट्ठी भर जाए। पर एक नियम हर नई लड़की को सबसे पहले सिखाया जाता था — साँझ की सीटी बजते ही सेक्शन नंबर बारह से बाहर निकल जाना। वहाँ, नाले के पास वाली ढलान पर, “टोकरी वाली” रहती है।

नई लड़की, पुराना डर

उन्नीस साल की बिजली मुंडा ने उस साल बागान में काम शुरू किया था। माँ बीमार थी, छोटा भाई स्कूल जाता था, और घर का सारा बोझ उसके कंधों पर आ गया था। वह मेहनती थी — इतनी कि पहले ही हफ़्ते में उसकी टोकरी सबसे भारी होने लगी।

पर तौल घर में हर शाम एक अजीब बात होती। मुंशी हरिपद की पुरानी तराज़ू पर बिजली की पत्ती हमेशा दो-तीन किलो कम निकलती। “गीली पत्ती है,” हरिपद मुस्कुराकर कहता, “पानी का वज़न काटना पड़ता है।” बाक़ी औरतें चुप रहतीं। सबको पता था कि हरिपद बरसों से यही करता आया है — और काटी हुई पत्ती का पैसा उसकी जेब में जाता है।

बिजली की पड़ोसन, बूढ़ी फुलमनी दादी ने एक दिन उसे समझाया, “मुँह मत खोलना, बेटी। जिसने भी आवाज़ उठाई, उसका नाम काम की लिस्ट से कट गया। और अगर ज़्यादा पत्ती चाहिए, तो भी बारह नंबर मत जाना। वहाँ की झाड़ियाँ सबसे घनी हैं, पर वो जगह सुनमती की है।”

“सुनमती कौन?”

दादी ने आँखें फेर लीं। “चालीस साल पहले की बात है। सुनमती भी तेरी तरह तेज़ थी, और तेरी तरह ही उसने तराज़ू पर सवाल उठाया था। उस वक़्त का मुंशी बहुत ज़ालिम था। एक शाम सुनमती बारह नंबर में पत्ती तोड़ने गई और लौटी नहीं। तीन दिन बाद नाले में उसकी टोकरी मिली — ख़ाली। तब से साँझ को वहाँ एक औरत दिखती है, पीठ पर टोकरी लिए। कहते हैं उसके पैर उल्टे हैं। वह पूछती है — मेरी पत्ती कहाँ गई?”

बारह नंबर की धुंध

महीने के आख़िर में बिजली के हाथ में मज़दूरी आई तो वह रो पड़ी। माँ की दवा के पैसे भी पूरे नहीं थे। अगले दिन उसने तय किया कि वह बारह नंबर में जाएगी — वहाँ की घनी झाड़ियों से दोगुनी पत्ती तोड़ लेगी, और साँझ की सीटी से पहले निकल आएगी।

दोपहर तक सब ठीक रहा। उसकी टोकरी भरती गई। पर पहाड़ों में धुंध घड़ी देखकर नहीं आती। चार बजते-बजते नाले की तरफ़ से सफ़ेद बादल रेंगता हुआ ऊपर चढ़ा और देखते-ही-देखते बिजली को अपनी ही उँगलियाँ धुंधली दिखने लगीं। दूर कहीं साँझ की सीटी बजी — पर आवाज़ किस दिशा से आई, वह समझ नहीं पाई।

तभी उसे पत्तियाँ टूटने की आवाज़ सुनाई दी। चट… चट… चट। ठीक उसकी बगल वाली कतार में। कोई बहुत तेज़ी से पत्ती तोड़ रहा था।

“कौन है? फुलमनी दादी?”

आवाज़ रुक गई। फिर धुंध के बीच एक आकृति उभरी — एक दुबली औरत, पुरानी लाल किनारी वाली साड़ी, पीठ पर बाँस की टोकरी, और खुले बाल जो घुटनों तक लटक रहे थे। वह बिजली की तरफ़ पीठ करके खड़ी थी। पर उसके पैर… उसके पैरों की उँगलियाँ बिजली की तरफ़ थीं। उल्टे पैर।

बिजली की चीख़ गले में अटक गई।

“डर मत,” औरत ने बिना मुड़े कहा। उसकी आवाज़ में नाले के पानी जैसी ठंडक थी। “तू पहली है जो मेरी झाड़ियों से इतनी इज़्ज़त से पत्ती तोड़ती है। दो पत्ती, एक कली — कभी तीन नहीं। बता, तेरी पत्ती कहाँ जाती है?”

तराज़ू का हिसाब

काँपती आवाज़ में बिजली ने सब बता दिया — गीली पत्ती का बहाना, कटा हुआ वज़न, माँ की दवा। औरत बहुत देर तक चुप रही। धुंध में उसकी टोकरी से पानी टपक रहा था, जैसे वह अभी-अभी नाले से निकली हो।

“चालीस साल,” उसने आख़िरकार कहा, “चालीस साल से तराज़ू वही है, सिर्फ़ हाथ बदलते हैं।” वह मुड़ी। बिजली ने उसका चेहरा देखा — वह डरावना नहीं था, बस बहुत थका हुआ, और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे। “कल साँझ को तू अपनी टोकरी तौलवाना। और तराज़ू को ध्यान से देखना।”

फिर वह धुंध में ऐसे घुल गई जैसे कभी थी ही नहीं। बिजली दौड़ती-गिरती बागान से बाहर निकली। उसकी टोकरी भरी हुई थी — पर उसे याद नहीं था कि आख़िरी आधा घंटा उसने पत्ती तोड़ी भी थी या नहीं।

तौल घर में

अगली शाम तौल घर में भीड़ थी। बिजली की बारी आई तो हरिपद ने आदत के मुताबिक़ टोकरी तराज़ू पर रखी और मुस्कुराकर बोला, “गीली है, तीन किलो कटेगा।”

तभी तौल घर की बत्ती झपकी। बाहर अचानक धुंध उठ आई — इतनी घनी कि दरवाज़े के पार कुछ नहीं दिखता था। और तराज़ू की सुई अपने-आप घूमने लगी। पहले बिजली की टोकरी का सही वज़न दिखा। फिर सुई और घूमी, और घूमती रही, जब तक कि हरिपद के पुराने रजिस्टर के पन्ने अपने-आप फड़फड़ाकर खुलने नहीं लगे।

सब औरतों ने देखा — हर पन्ने पर, हर नाम के आगे, लाल स्याही में एक नई संख्या उभर रही थी। कितना काटा गया, कब काटा गया। फुलमनी दादी का नाम, सुखिया का नाम, बीस साल पुराने नाम। और सबसे पहले पन्ने पर, जो उस रजिस्टर का था ही नहीं, एक नाम चमका — सुनमती उरांव।

हरिपद पीछे हटा और किसी चीज़ से टकराया। उसने मुड़कर देखा। दरवाज़े पर पीठ पर टोकरी लिए एक औरत खड़ी थी। टोकरी से नाले का पानी टपक रहा था।

“मेरी पत्ती कहाँ गई, मुंशी?”

हरिपद बेहोश होकर गिर पड़ा।

पूरा हिसाब

उस रात के बाद बहुत कुछ बदल गया। मजदूर यूनियन ने रजिस्टर की जाँच की माँग की, और बागान के नए मैनेजर ने तौल के लिए डिजिटल मशीनें लगवा दीं जिनकी पर्ची हर मज़दूर को मिलती थी। हरिपद ने नौकरी छोड़ दी और गाँव चला गया। लोग कहते हैं वह अब भी धुंध वाली शामों में दरवाज़ा बंद करके बैठता है।

बिजली को उसी साल बागान में महिला सुपरवाइज़र बनाया गया — मेघझोरा की पहली। उसने सबसे पहला काम यह किया कि सेक्शन बारह के नाले के पास एक छोटा-सा पत्थर का चबूतरा बनवाया। हर साल पहली फ़्लश की पहली तुड़ाई में, बिजली दो पत्ती और एक कली उस चबूतरे पर रख आती है।

और बागान की औरतें कहती हैं कि अब बारह नंबर की धुंध पहले जितनी डरावनी नहीं लगती। कभी-कभी साँझ ढलते वहाँ पत्ती टूटने की हल्की आवाज़ आती है — चट… चट… चट। पर अब वह आवाज़ किसी को डराती नहीं। बस याद दिलाती है कि हर पत्ती का हिसाब होता है।

नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।

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