ओडिशा के दक्षिणी तट पर, जहाँ बंगाल की खाड़ी की लहरें काली चट्टानों से सिर टकराती हैं, बालीपाट का लाइटहाउस खड़ा है — सफ़ेद और लाल धारियों वाली एक पुरानी मीनार, जिसकी चोटी से हर दस सेकंड में रोशनी की एक लंबी बाँह समंदर पर घूमती है।
माधव पाणिग्रही की उम्र छब्बीस साल थी जब उसे बालीपाट पर लाइटहाउस अटेंडेंट की नौकरी मिली। काम आसान था — लैंप अब बिजली से चलता था, बस मशीनों की देखभाल करनी होती थी, लॉगबुक भरनी होती थी, और रात भर जागना होता था। माधव को अकेलापन पसंद था। कम से कम पहले हफ़्ते तक तो यही लगा।
चट्टान पर बैठी लड़की
आठवीं रात, जब पूर्णिमा का चाँद समंदर पर चाँदी बिछा रहा था, माधव ने गैलरी से नीचे देखा। लाइटहाउस के ठीक नीचे, सबसे आगे वाली चट्टान पर, एक लड़की बैठी थी। सफ़ेद-लाल बोमकाई साड़ी, गीले बाल, घुटनों को बाँहों में समेटे — और नज़रें समंदर पर।
रात के दो बजे, उस चट्टान पर, जहाँ ज्वार में लहरें दस फ़ुट ऊपर तक उछलती थीं। माधव सीढ़ियाँ उतरकर नीचे भागा।
“सुनिए! वहाँ ख़तरा है, ज्वार चढ़ रहा है!”
लड़की ने मुड़कर देखा। उसकी आँखें बड़ी और शांत थीं, जैसे समंदर की गहराई ने उनमें घर बना लिया हो। “मुझे पता है,” उसने मुस्कुराकर कहा। “मैं रोज़ यहीं बैठती हूँ। तुम नए हो न?”
उसका नाम लक्ष्मी था। वह पास के मछुआरा गाँव की थी, उसने बताया। उसका पति भोला समंदर में गया था और अभी लौटा नहीं था। “वह लौटेगा,” लक्ष्मी ने कहा, “बस उसे रास्ता दिखना चाहिए।”
पुराना तेल का दीया
उसके बाद लक्ष्मी हर रात आने लगी। कभी चट्टान पर, कभी लाइटहाउस की सीढ़ियों के नीचे। वे घंटों बातें करते — मछुआरों के गीतों की, जगन्नाथ की रथयात्रा की, माधव के गाँव की अमराई की। माधव को पता ही नहीं चला कब वह हर शाम उसका इंतज़ार करने लगा। कब उसकी लॉगबुक के हाशियों पर उसका नाम लिखा जाने लगा।
एक रात लक्ष्मी ने लाइटहाउस के स्टोररूम की ओर इशारा किया। “वहाँ एक पुराना पीतल का तेल वाला दीया है। बिजली आने से पहले उसी से रोशनी होती थी। उसे जला दोगे? बिजली की रोशनी बहुत तेज़ है, बहुत ठंडी। भोला को वो पुरानी पीली रोशनी पहचान में आती है।”
माधव ने स्टोर में ढूँढ़ा। सचमुच, जाले और ज़ंग के बीच एक भारी पीतल का लैंप रखा था। उसने उसे साफ़ किया, केरोसिन भरा और गैलरी में जला दिया। पीली लौ हवा में काँपी, और नीचे चट्टान पर बैठी लक्ष्मी ने आँखें बंद करके हाथ जोड़ लिए।
उस रात माधव ने उसकी उँगलियाँ छूने की कोशिश की। वे बर्फ़ जैसी ठंडी और गीली थीं — जैसे अभी-अभी लहरों से निकली हों। लक्ष्मी ने हाथ धीरे से छुड़ा लिया। “मैं किसी और का इंतज़ार कर रही हूँ, माधव। यह मत भूलना।”
लॉगबुक का सच
कुछ दिन बाद माधव ने गाँव जाकर भोला के बारे में पूछा। मछुआरों ने उसे अजीब नज़रों से देखा। फिर गाँव के सबसे बूढ़े आदमी, सनातन बाबा, ने उसे लाइटहाउस की पुरानी लॉगबुक दिखाने को कहा — 1999 वाली।
माधव ने अक्टूबर 1999 के पन्ने खोले। सुपर साइक्लोन। तीन सौ किलोमीटर प्रति घंटे की हवाएँ। लॉगबुक में तत्कालीन कीपर ने लिखा था: “29 अक्टूबर। बिजली गुल। तेल का दीया जलाया। रात 1 बजे एक मछुआरिन, लक्ष्मी, अपने पति की नाव देखने चट्टान पर गई। रोकने की कोशिश की। लहर उसे ले गई। शव नहीं मिला। उसका पति भोला अगली सुबह 40 किलोमीटर दूर किनारे पर ज़िंदा मिला।”
माधव के हाथ से लॉगबुक गिर गई।
“भोला ज़िंदा है?” उसने पूछा।
सनातन बाबा ने सिर हिलाया। “पास के गाँव में रहता है। सत्तर साल का हो गया। उसने दोबारा शादी नहीं की। हर साल 29 अक्टूबर को किनारे पर आकर बैठता है, पर लाइटहाउस के पास नहीं आता। कहता है — वहाँ की रोशनी देखी नहीं जाती।”
आज 27 अक्टूबर था।
29 अक्टूबर की रात
माधव के सामने अजीब धर्मसंकट था। वह लक्ष्मी से प्यार करने लगा था — एक ऐसी लड़की से जो पच्चीस साल पहले मर चुकी थी। और जिसके लिए वह इंतज़ार कर रही थी, वह आदमी ज़िंदा था, बस कुछ किलोमीटर दूर।
अगले दिन माधव भोला के घर गया। झुकी कमर, धुंधली आँखें, और दीवार पर एक धुंधली फ़्रेम की हुई तस्वीर — सफ़ेद-लाल बोमकाई साड़ी में एक लड़की। माधव ने सब बताया। भोला बहुत देर तक कुछ नहीं बोला। फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“उस रात मैं लौटना चाहता था,” भोला ने कहा, “पर तूफ़ान ने मेरी नाव कहीं और फेंक दी। मैं पच्चीस साल से सोचता हूँ कि अगर मैं लौट आता, तो वह चट्टान पर नहीं जाती।”
29 अक्टूबर की रात माधव ने पीतल का दीया जलाया। भोला लाठी के सहारे लाइटहाउस की सीढ़ियों तक आया। चट्टान पर लक्ष्मी बैठी थी — वैसी ही, जैसी पच्चीस साल पहले थी।
भोला लड़खड़ाते क़दमों से चट्टान की ओर बढ़ा। लक्ष्मी उठी। माधव ने देखा — जैसे-जैसे भोला उसके क़रीब गया, उसकी झुकी कमर सीधी होने लगी, बाल काले हो गए, चेहरे की झुर्रियाँ मिट गईं। चट्टान पर अब दो जवान लोग खड़े थे, एक-दूसरे का हाथ थामे।
लक्ष्मी ने मुड़कर लाइटहाउस की गैलरी की ओर देखा, जहाँ माधव खड़ा था। उसने होंठों से कुछ कहा। हवा के शोर में आवाज़ नहीं आई, पर माधव समझ गया — “धन्यवाद।”
अगली लहर आई, और चट्टान ख़ाली थी।
पीली रोशनी
अगली सुबह भोला लाइटहाउस की सीढ़ियों पर बैठा मिला — शांत, आँखें बंद, होंठों पर मुस्कान। डॉक्टर ने कहा, नींद में दिल रुक गया। उम्र हो गई थी।
माधव ने उसका अंतिम संस्कार गाँव वालों के साथ मिलकर किया। उस दिन के बाद चट्टान पर कोई नहीं बैठा।
माधव आज भी बालीपाट पर है। लाइटहाउस की बिजली वाली रोशनी हर दस सेकंड में समंदर पर घूमती है, जैसा नियम है। पर हर रात, गैलरी के एक कोने में, एक पीतल का दीया भी जलता है — छोटी-सी पीली लौ, जो किसी जहाज़ के काम की नहीं।
मछुआरे पूछते हैं तो माधव कहता है, “कोई रास्ता ढूँढ़ रहा हो, तो उसे पुरानी रोशनी ही पहचान में आती है।” और फिर वह समंदर की ओर देखता है, जहाँ कभी-कभी, पूर्णिमा की रातों में, लहरों पर दो परछाइयाँ साथ चलती दिखती हैं।
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नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।




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