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खदान की आख़िरी शिफ़्ट

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बंद कोयला खदान की पुरानी लिफ़्ट के पास हेलमेट लैंप लिए इंजीनियर और अँधेरी सुरंग में खड़े भूतिया खनिक

झारखंड के कोयला इलाक़े में बेलगढ़ा कोलियरी का नाम अब पुराने नक़्शों में ही मिलता है। ज़मीन के नीचे सालों से सुलगती आग, ऊपर धुएँ की पतली लकीरें, टूटे हुए क्वार्टर, और बीच में लोहे का एक ऊँचा ढाँचा — शाफ़्ट नंबर दो का हेडगियर, जिसकी बड़ी चरखी पर जंग की मोटी परत चढ़ी है। चालीस साल से वह शाफ़्ट बंद है।

रितिका महतो एक युवा माइनिंग इंजीनियर थी। एक प्राइवेट कंपनी ने बेलगढ़ा का पट्टा लिया था और पुरानी सीम (कोयले की परत) फिर से खोलना चाहती थी। रितिका का काम था शाफ़्ट नंबर दो का सर्वे करके रिपोर्ट देना कि खुदाई सुरक्षित है या नहीं। कंपनी के मैनेजर सक्सेना ने पहले ही दिन साफ़ कह दिया था — “रिपोर्ट पॉज़िटिव चाहिए, मैडम। ऊपर से दबाव है।”

3 बजे की घंटी

रितिका कोलियरी के पुराने गेस्ट हाउस में ठहरी थी, शाफ़्ट से सौ मीटर दूर। पहली रात, ठीक तीन बजे, उसकी नींद एक आवाज़ से खुली — टन… टन… टन। एक धातु की घंटी, जैसी पुराने ज़माने में खदान की लिफ़्ट (केज) चलाने से पहले बजाई जाती थी। तीन घंटियों का मतलब — “आदमी नीचे जा रहे हैं।”

उसने खिड़की से देखा। शाफ़्ट नंबर दो की चरखी घूम रही थी। धीरे-धीरे, कराहती हुई, जैसे बरसों बाद जागी हो। बिजली की कोई लाइन वहाँ तक नहीं जाती थी।

सुबह उसने चौकीदार मंगरू से पूछा। बूढ़ा मंगरू कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “आख़िरी शिफ़्ट है, दीदी। तेरासी से रोज़ उतरती है। कभी ऊपर नहीं आई।”

तेरासी की बाढ़

मंगरू ने जो बताया, वह किसी सरकारी फ़ाइल में दर्ज नहीं था। 1983 की बरसात में शाफ़्ट नंबर दो की तीसरी लेवल पर रात की शिफ़्ट चल रही थी — सत्ताईस खनिक। मैनेजमेंट को पता था कि बगल की पुरानी, छोड़ी हुई खदान में पानी भरा है, और दोनों के बीच की कोयले की दीवार पतली हो चुकी है। पर उत्पादन का टारगेट था। ओवरमैन ने चेतावनी दी तो उसे चुप करा दिया गया।

रात तीन बजे दीवार टूटी। पानी इतनी तेज़ी से आया कि कोई ऊपर नहीं आ सका। मंगरू उस रात लिफ़्ट चला रहा था। उसने तीन घंटियाँ बजाईं, लिफ़्ट नीचे भेजी — पर वह ख़ाली लौटी। “उसके बाद शाफ़्ट सील कर दिया गया। मुआवज़ा मिला, फ़ाइल बंद हुई। पर वो सत्ताईस अब भी हर रात अपनी शिफ़्ट पर जाते हैं, दीदी।”

रितिका विज्ञान की छात्रा थी। उसने सोचा, बूढ़े आदमी का दुख है, कहानी बन गया। पर उसकी जिज्ञासा जाग चुकी थी।

केज के भीतर

तीसरी रात रितिका ने तय किया कि वह देखेगी। उसने हेलमेट पहना, कैप लैंप जलाया, गैस डिटेक्टर लिया, और ढाई बजे शाफ़्ट के पास पहुँच गई। हेडगियर के नीचे लोहे का पुराना केज खड़ा था — जंग लगी जालीदार दीवारें, लकड़ी का फ़र्श। उसका दरवाज़ा खुला था।

ठीक तीन बजे घंटी बजी। टन… टन… टन।

रितिका ने देखा — केज के लकड़ी के फ़र्श पर कोयले की धूल में पैरों के निशान उभरने लगे। एक, दो, दस… बहुत सारे। नंगे पैर, रबर के जूते, चप्पलें। केज भर गया, पर उसमें कोई दिख नहीं रहा था। और फिर किसी ने, बहुत धीरे से, उसके कंधे को छुआ — जैसे भीड़ में कोई रास्ता माँग रहा हो।

वह डर से पीछे हटी नहीं। वह आगे बढ़ी और केज में दाख़िल हो गई।

दरवाज़ा बंद हुआ। केज नीचे उतरने लगा।

तीसरी लेवल

अँधेरा, ठंडी नम हवा, और नीचे से आती पानी के टपकने की आवाज़। उसका गैस डिटेक्टर सामान्य दिखा रहा था, पर उसकी साँसें तेज़ थीं। केज एक झटके से रुका। दीवार पर सफ़ेद पेंट से लिखा था — “लेवल 3″।

उसके कैप लैंप की रोशनी में गलियारा दिखा। और गलियारे में वे थे। सत्ताईस आदमी, पुरानी हेलमेट-बत्तियाँ लिए, कोयले से सने चेहरे, चुपचाप लाइन में खड़े। उनमें सबसे आगे एक अधेड़ आदमी था, कंधे पर ओवरमैन का पीतल का बिल्ला।

उसने कुछ कहा नहीं। बस अपना हाथ उठाकर गलियारे की दाईं दीवार की ओर इशारा किया। रितिका ने रोशनी डाली। दीवार गीली थी। उस पर बूँदें नहीं, पानी की पतली धारें बह रही थीं। उसने हथौड़ी से हल्के से ठोका — आवाज़ खोखली थी।

पुरानी बाढ़ वाली खदान अब भी पानी से भरी थी। और जिस नई सीम को कंपनी खोलना चाहती थी, उसका नक़्शा ठीक इसी दीवार के पीछे से होकर जाता था।

ओवरमैन ने अपनी जेब से कुछ निकालकर उसकी हथेली पर रखा — एक मुड़ा हुआ, पानी से धुंधला काग़ज़। जब रितिका ने सिर उठाया, गलियारा ख़ाली था। केज की घंटी बजी। एक बार — “ऊपर।”

रिपोर्ट

ऊपर पहुँचकर रितिका ने काग़ज़ खोला। वह 1983 की एक हाथ से लिखी चिट्ठी थी, ओवरमैन रघुनाथ सिंह के दस्तख़त के साथ, मैनेजमेंट के नाम — “लेवल 3 की पूर्वी दीवार से रिसाव बढ़ रहा है। बगल की खदान का पानी किसी भी दिन आ सकता है। तुरंत काम रोका जाए।” उस पर किसी ने लाल स्याही से लिखा था: “अस्वीकृत। उत्पादन जारी रखें।”

अगले दिन रितिका ने अपनी रिपोर्ट जमा की — “शाफ़्ट नंबर दो की पूर्वी सीम असुरक्षित है। बगल की पुरानी खदान में भारी जल-भराव है। खुदाई से बड़ा हादसा हो सकता है।” साथ में उसने रिसाव के फ़ोटो, सैंपल और 1983 की वह चिट्ठी लगा दी।

सक्सेना ने रिपोर्ट बदलने को कहा। रितिका ने मना कर दिया और उसकी कॉपी सीधे खान सुरक्षा विभाग को भेज दी। जाँच हुई। पुरानी फ़ाइल फिर खुली। खुदाई की अनुमति रद्द हुई, और सत्ताईस खनिकों के परिवारों को पहली बार आधिकारिक माफ़ी मिली।

शाफ़्ट नंबर दो के पास अब एक पत्थर का स्मारक है, जिस पर सत्ताईस नाम खुदे हैं। सबसे ऊपर लिखा है — “ओवरमैन रघुनाथ सिंह, जिन्होंने चेतावनी दी थी।”

मंगरू कहता है कि उस रिपोर्ट के बाद तीन बजे की घंटी फिर नहीं बजी। बस एक बार, स्मारक के उद्घाटन की रात, बहुत दूर से एक घंटी सुनाई दी थी। सिर्फ़ एक — “ऊपर।” आख़िरी शिफ़्ट आख़िरकार ख़त्म हो गई थी।

नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।

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