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आख़िरी शो, सीट नंबर तेरह

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पुराने सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल में प्रोजेक्टर की रोशनी और सीट पर बैठा पारदर्शी भूतिया दर्शक

कानपुर के पुराने बाज़ार में “रूपम टॉकीज़” पचास साल तक शहर की शान रहा। लाल मख़मली परदे, बालकनी की ऊँची कुर्सियाँ, इंटरवल में समोसे की ख़ुशबू और फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो पर सीटियों का शोर। फिर मल्टीप्लेक्स आए, दर्शक घटे, और आख़िरकार मालिकों ने हॉल बेच दिया। अगले सोमवार उसे तोड़कर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनना था।

कबीर श्रीवास्तव मुंबई में फ़िल्म की पढ़ाई कर रहा था। उसके दादाजी, स्वर्गीय दीनानाथ श्रीवास्तव, चालीस साल तक रूपम के प्रोजेक्शनिस्ट रहे थे। कबीर हॉल गिरने से पहले उस पर एक छोटी डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहता था। नए मालिक ने बड़ी मुश्किल से उसे तीन रातें दीं — “बस, रात को ही शूट करना। दिन में मज़दूर सामान निकालेंगे।”

पहली रात: प्रोजेक्टर

पहली रात कबीर ने कैमरा बालकनी में लगाया और प्रोजेक्शन रूम का दरवाज़ा खोला। भीतर दादाजी की पुरानी 35 एमएम मशीनें धूल में लिपटी खड़ी थीं — जैसे दो बूढ़े पहरेदार। दीवार पर अब भी दादाजी के हाथ से लिखी एक पर्ची चिपकी थी: “रील बदलने से पहले सीट J-13 देख लेना।”

कबीर मुस्कुराया। दादाजी की यह आदत उसे याद थी — वे कहते थे कि हर शो में एक “ख़ास दर्शक” आता है, और उसकी सीट हमेशा ख़ाली रखनी चाहिए। बचपन में कबीर इसे मज़ाक समझता था।

रात 12:10 पर, जब कबीर बालकनी से ख़ाली हॉल के वाइड शॉट ले रहा था, उसके पीछे प्रोजेक्टर अपने-आप घरघराने लगा। रोशनी की एक लंबी किरण हॉल के अँधेरे को चीरती हुई सफ़ेद परदे पर पड़ी। परदे पर ब्लैक एंड व्हाइट अक्षर उभरे — “चाँदनी का सौदा — निर्देशक: शेखर सिन्हा”।

कबीर दौड़कर प्रोजेक्शन रूम गया। मशीन चल रही थी, रील घूम रही थी — पर उसने कोई रील लगाई ही नहीं थी। और नीचे, ख़ाली हॉल में, ठीक बीचोबीच, सीट J-13 पर कोई बैठा था।

J-13 का दर्शक

कबीर ने कैमरे का ज़ूम बढ़ाया। सीट पर एक आदमी था — सत्तर के दशक का सफ़ारी सूट, घने बाल, मोटे फ़्रेम का चश्मा। वह परदे को ऐसे देख रहा था जैसे दुनिया में उसके लिए और कुछ बचा ही न हो।

“एक्सक्यूज़ मी!” कबीर ने बालकनी से आवाज़ लगाई। “हॉल बंद है, आप अंदर कैसे आए?”

आदमी ने मुड़कर ऊपर देखा। प्रोजेक्टर की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी — और कबीर ने देखा कि रोशनी उसके चेहरे से होकर पीछे की कुर्सी पर पड़ रही थी। जैसे वह वहाँ होकर भी नहीं था।

“दीनानाथ का पोता है न?” आदमी ने कहा। उसकी आवाज़ पुराने रेडियो जैसी खरखराती थी। “उसकी तरह ही रील बदलने में देर करता है।”

अगले पल प्रोजेक्टर बंद हो गया, हॉल में अँधेरा छा गया, और जब कबीर ने टॉर्च जलाई, सीट J-13 ख़ाली थी। सिर्फ़ उसका लाल मख़मल नीचे दबा हुआ था, जैसे कोई अभी-अभी उठा हो।

दूसरी रात: अधूरी फ़िल्म

अगले दिन कबीर ने इंटरनेट और पुराने अख़बारों की वेबसाइटें खंगालीं। शेखर सिन्हा — कानपुर के एक युवा निर्देशक, जिनकी पहली फ़िल्म “चाँदनी का सौदा” का प्रीमियर 1978 में रूपम टॉकीज़ में होना था। प्रीमियर की रात हॉल के प्रोजेक्शन रूम में आग लगी। फ़िल्म का एकमात्र प्रिंट जल गया, और शेखर सिन्हा उसी रात से लापता हो गए। पुलिस ने मान लिया कि क़र्ज़ से परेशान होकर वे शहर छोड़कर भाग गए।

दूसरी रात कबीर तैयार था। 12:10 पर प्रोजेक्टर फिर चला। इस बार उसने फ़िल्म देखी। कहानी एक ग़रीब कलाकार की थी, जिसके सपने एक लालची सेठ ख़रीद लेता है। पर बीच-बीच में फ़िल्म अजीब हो जाती — कहानी रुक जाती और परदे पर रूपम टॉकीज़ का ही प्रोजेक्शन रूम दिखता। एक आदमी, जो हू-ब-हू हॉल के पुराने मालिक सेठ गिरधारीलाल जैसा दिखता था, शेखर से बहस कर रहा था। फिर एक धक्का। फिर लौ।

और फिर एक शॉट जो किसी फ़िल्म में नहीं हो सकता था — परदे के पीछे की दीवार, ईंटों की एक नीची मेहराब, और उस पर चॉक से बना एक निशान: एक तारा।

सीट J-13 पर बैठे आदमी ने धीरे से कहा, “प्रिंट जला था, कबीर। नेगेटिव नहीं।”

परदे के पीछे

तीसरी और आख़िरी रात कबीर ने हथौड़ा और टॉर्च लिए परदे के पीछे की संकरी जगह में क़दम रखा। धूल, चमगादड़ों की गंध, और पुराने स्पीकरों के ढाँचे। दीवार के निचले हिस्से में उसे वह मेहराब मिली। प्लास्टर के नीचे, धुंधला-सा, चॉक का एक तारा।

दो घंटे की मेहनत के बाद ईंटें निकलीं। भीतर एक छोटा-सा खोखला था, और उसमें जंग लगे टिन के छह गोल डिब्बे — फ़िल्म नेगेटिव के कैन। सबसे ऊपर एक मोमजामे में लिपटी डायरी।

डायरी शेखर सिन्हा की थी। आख़िरी पन्ने पर लिखा था: “गिरधारीलाल चाहता है कि मैं फ़िल्म के अधिकार उसके नाम कर दूँ, वरना वह प्रिंट जला देगा। मैंने नेगेटिव यहाँ छिपा दिया है। सिर्फ़ दीनानाथ को पता है। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो यह फ़िल्म एक दिन लोगों तक पहुँचनी चाहिए।”

कबीर की आँखें भर आईं। दादाजी जानते थे। शायद वे डर गए थे, शायद उन्हें किसी ने चुप करा दिया था। पर उन्होंने चालीस साल तक J-13 की सीट ख़ाली रखी — एक दोस्त के इंतज़ार में।

जब वह कैन लेकर बाहर आया, हॉल के परदे पर प्रोजेक्टर की रोशनी फिर पड़ रही थी। इस बार परदे पर कोई फ़िल्म नहीं थी — बस दो अक्षर: “समाप्त”। J-13 पर बैठा आदमी खड़ा हुआ, कबीर की ओर देखकर हल्का-सा सिर झुकाया, और रोशनी की किरण में धीरे-धीरे घुल गया।

इंटरवल के बाद

सोमवार को रूपम टॉकीज़ गिरा दिया गया। पर कबीर ने नेगेटिव पुणे के फ़िल्म संग्रहालय को सौंप दिए, जहाँ उन्हें साफ़ करके नया प्रिंट बनाया गया। अगले साल एक फ़िल्म समारोह में “चाँदनी का सौदा” पहली बार दिखाई गई — 47 साल की देरी से। स्क्रीनिंग से पहले कबीर ने मंच से शेखर सिन्हा और अपने दादाजी, दोनों के बारे में बताया।

फ़िल्म के बाद हॉल तालियों से गूँज उठा। कबीर ने अपनी पंक्ति में बग़ल वाली सीट की तरफ़ देखा। उसने वह सीट जानबूझकर ख़ाली छोड़ी थी।

सीट का नंबर था — तेरह।

उसका मख़मल हल्का-सा दबा हुआ था।

नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।

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