पूजा वर्मा को जब पहली पोस्टिंग का पत्र मिला, तो उसने नक़्शे पर “कुंडलीघाट” ढूँढ़ने में बीस मिनट लगाए। सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच घाट सेक्शन का एक छोटा-सा स्टेशन, जहाँ दिन में दो पैसेंजर रुकती थीं और रात भर मालगाड़ियाँ और एक्सप्रेस गाड़ियाँ धड़धड़ाती हुई गुज़र जाती थीं। स्टेशन के एक तरफ़ गहरी खाई थी, दूसरी तरफ़ लाल मिट्टी की ऊँची कटिंग।
स्टेशन से क़रीब आधा किलोमीटर आगे, सुरंग के मुहाने के पास, एक टूटा-फूटा केबिन खड़ा था। उसकी दीवार पर सफ़ेद पेंट से लिखा था — “केबिन नं. 7″। सिग्नलिंग का काम अब पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक पैनल से होता था, इसलिए वह केबिन 1989 से बंद पड़ा था।
2:40 की लालटेन
पहली रात की ड्यूटी में पूजा के साथ पॉइंट्समैन गोपाल काका थे — साठ के क़रीब, कम बोलने वाले, बीड़ी के शौक़ीन। रात दो बजे के बाद स्टेशन पर इतना सन्नाटा था कि झींगुरों की आवाज़ भी किसी मशीन जैसी लगती थी।
ठीक 2:40 पर पूजा ने खिड़की से बाहर देखा और उसकी साँस रुक गई। केबिन नंबर सात की खिड़की में लाल रोशनी झूल रही थी — जैसे कोई पुरानी केरोसिन लालटेन हाथ में लेकर दाएँ-बाएँ हिला रहा हो। वह रेलवे का पुराना संकेत था: रुको, ख़तरा है।
“काका! वहाँ कोई है!”
गोपाल काका ने बिना सिर उठाए कहा, “रामप्रसाद है, मैडम। आप अपना काम करो। वो अपना काम कर रहा है।”
“कौन रामप्रसाद? वह केबिन तो बंद है!”
काका ने बीड़ी बुझाई। “बंद केबिन है, बंद आदमी नहीं।” इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा। पंद्रह मिनट बाद लाल रोशनी अपने-आप बुझ गई।
पुराना रजिस्टर
अगले दिन पूजा ने स्टेशन के पुराने रिकॉर्ड-रूम की धूल छानी। दीमक लगी फ़ाइलों के बीच उसे 1989 का एक “ट्रेन सिग्नल रजिस्टर” मिला, जिसके आख़िरी पन्ने पर काँपती लिखावट में लिखा था —
“14 अगस्त, रात 2:35। लगातार बारिश। सुरंग के पास कटिंग से पत्थर गिरने की आवाज़। ए.एस.एम. साहब को फ़ोन किया, उन्होंने कहा लाइन क्लियर है, गाड़ी निकालो। मैं लालटेन लेकर ट्रैक देखने जा रहा हूँ। — रामप्रसाद यादव, केबिनमैन।”
उसके बाद कोई एंट्री नहीं थी।
गोपाल काका ने आख़िरकार पूरी बात बताई। उस रात रामप्रसाद ने ख़तरे की ख़बर दी थी, पर ड्यूटी पर बैठे अफ़सर ने जल्दबाज़ी में उसकी बात अनसुनी कर दी। रामप्रसाद लालटेन लेकर पटरी पर दौड़ा, ताकि आने वाली मालगाड़ी के ड्राइवर को रोक सके। ड्राइवर ने लाल रोशनी देखकर ब्रेक लगा दिए — गाड़ी पत्थरों के ढेर से कुछ मीटर पहले रुक गई। पर उसी वक़्त कटिंग से दूसरा बड़ा पत्थर गिरा, और रामप्रसाद उसके नीचे आ गया।
“तब से,” काका ने कहा, “जब भी घाट में ख़तरा होता है, रामप्रसाद की लालटेन जलती है। लोग डरते हैं, इसलिए कोई इसकी बात नहीं करता। पर मैं तीस साल से यहाँ हूँ, मैडम — उसकी लालटेन कभी झूठ नहीं बोलती।”
मानसून की वह रात
अगस्त आया, और उसके साथ सतपुड़ा की ज़िद्दी बारिश। लगातार तीन दिन से पानी गिर रहा था। चौथी रात पूजा अकेली ड्यूटी पर थी, क्योंकि गोपाल काका बीमार होकर घर चले गए थे। रात 2:20 पर कंट्रोल रूम से संदेश आया — मुंबई जाने वाली सुपरफ़ास्ट एक्सप्रेस बीस मिनट में कुंडलीघाट से गुज़रेगी। पैनल पर सारे सिग्नल हरे थे। ट्रैक सर्किट में कोई गड़बड़ नहीं दिख रही थी।
ठीक 2:40 पर केबिन नंबर सात में लाल लालटेन जल उठी।
इस बार वह सिर्फ़ झूल नहीं रही थी — वह पागलों की तरह दाएँ-बाएँ हिल रही थी। और फिर, बारिश के शोर के बीच, पूजा ने एक आवाज़ सुनी — दूर से आती, भारी और साफ़: “रोको! गाड़ी रोको!”
पूजा के सामने दो रास्ते थे। पैनल कह रहा था सब ठीक है। एक मरे हुए आदमी की लालटेन कह रही थी कि ख़तरा है। अगर वह गाड़ी रोकती और कुछ न निकलता, तो जाँच होती, नौकरी पर सवाल उठते। अगर नहीं रोकती और कुछ हो जाता…
उसने रजिस्टर की वह आख़िरी लाइन याद की — “उन्होंने कहा लाइन क्लियर है।”
पूजा ने सिग्नल लाल किया और कंट्रोल को फ़ोन घुमाया। “कुंडलीघाट से बोल रही हूँ। सुरंग के पास संदिग्ध रुकावट। एक्सप्रेस को पिछले स्टेशन पर रोकिए। मैं ज़िम्मेदारी लेती हूँ।”
सुबह का सच
भोर होते ही इंजीनियरिंग टीम ट्रॉली लेकर सुरंग की ओर गई। पूजा भी साथ थी। सुरंग के मुहाने से ठीक पहले, जहाँ ट्रैक मोड़ लेता है, कटिंग का एक बड़ा हिस्सा धँसकर पटरी पर आ गिरा था। पत्थर पटरी के ठीक ऊपर नहीं, उसके किनारे पर टिके थे — इसलिए ट्रैक सर्किट ने कोई ख़राबी नहीं दिखाई थी। पर अगर एक्सप्रेस उस मोड़ पर पूरी रफ़्तार से आती, तो किनारे के पत्थर से टकराकर इंजन खाई की तरफ़ झुक सकता था।
सीनियर इंजीनियर ने पूजा की पीठ थपथपाई। “तुम्हें कैसे पता चला? यह तो किसी सेंसर में नहीं आता।”
पूजा ने बस इतना कहा, “किसी ने बताया था, सर।”
उस शाम वह अकेली केबिन नंबर सात तक गई। जंग लगे दरवाज़े को धक्का दिया। भीतर धूल की मोटी परत थी, लीवर टूटे पड़े थे — और कोने में एक पुरानी, काली पड़ चुकी केरोसिन लालटेन रखी थी। उसका काँच अब भी गर्म था।
मेज़ पर वही 1989 वाला रजिस्टर खुला पड़ा था, जिसे पूजा ने रिकॉर्ड-रूम में वापस रख दिया था। आख़िरी पन्ने पर, 35 साल पुरानी लिखावट के नीचे, स्याही में एक नई पंक्ति थी —
“लाइन रोकी गई। गाड़ी सुरक्षित। ड्यूटी पूरी। — रा. प्र. या.”
विदाई
उस मानसून के बाद केबिन नंबर सात की लालटेन फिर कभी नहीं जली। गोपाल काका ने कहा, “शायद उसे भरोसा हो गया कि अब स्टेशन पर कोई है जो उसकी बात सुनेगा।”
पूजा ने रेलवे बोर्ड को एक रिपोर्ट भेजी, जिसमें घाट की कटिंग पर पत्थर गिरने की चेतावनी के लिए नए सेंसर लगाने की सिफ़ारिश थी। रिपोर्ट मंज़ूर हुई। उसने एक और अर्ज़ी दी — केबिन नंबर सात के बाहर एक छोटी-सी पट्टिका लगाने की।
आज वहाँ लिखा है: “स्व. रामप्रसाद यादव, केबिनमैन — जिन्होंने 14 अगस्त 1989 को अपनी जान देकर एक गाड़ी बचाई।” और पट्टिका के नीचे, हर साल 14 अगस्त की रात, कोई एक दीया जला जाता है। पूजा कहती है वह गोपाल काका जलाते हैं। गोपाल काका कहते हैं, पूजा।
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नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।




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