पूर्वी दिल्ली की एक कॉलोनी में हर मंगलवार सड़क के दोनों किनारे बाज़ार सजता है। सब्ज़ियाँ, चूड़ियाँ, सस्ते कपड़े, स्टील के बर्तन, और भीड़ इतनी कि पैदल चलना मुश्किल। नेहा अरोड़ा ऑफ़िस से लौटते हुए अक्सर यहीं से सब्ज़ी ले लेती थी।
उस मंगलवार बाज़ार के आख़िरी छोर पर, जहाँ स्ट्रीट लाइट ख़राब थी, उसे एक नई दुकान दिखी। ज़मीन पर बिछी एक मैली चादर, उस पर पुराने पीतल के ताले, टूटी घड़ियाँ, और बीच में एक कपड़े की गुड़िया। गुड़िया के कपड़े पुराने ज़माने के थे, आँखें काले बटन की, और होंठ लाल धागे से सिले हुए — मुस्कुराते हुए।
पचास रुपये का सौदा
दुकान पर एक बूढ़ी औरत बैठी थी, जिसका चेहरा घूँघट में छिपा था। “ले जा, बिटिया,” उसने कहा, जैसे नेहा के मन की बात पढ़ ली हो। “पचास रुपये। यह गुड़िया अपने मालिक की सुनती है।”
नेहा हँसी। “क्या सुनती है?”
“जो तू चाहे। बस एक बात याद रखना — यह कुछ बनाती नहीं, सिर्फ़ इधर से उधर करती है।”
नेहा को बात समझ नहीं आई, पर गुड़िया में कुछ ऐसा था कि उसने पचास का नोट निकालकर दे दिया। घर पहुँचकर उसने गुड़िया को अपनी स्टडी टेबल पर रख दिया, लैपटॉप के बगल में।
उस रात, ऑफ़िस का काम करते हुए, थकी-हारी नेहा ने मज़ाक में गुड़िया से कहा, “सुन, अगर सच में सुनती है, तो इस बार प्रमोशन मुझे दिला दे। सिन्हा को नहीं।”
गुड़िया के सिले हुए होंठ टेबल लैंप की रोशनी में थोड़े और फैले हुए लगे। नेहा ने सोचा, थकान है।
पहली इच्छा
अगली सुबह ऑफ़िस में ख़बर आई कि रितिका सिन्हा — जो प्रमोशन की दौड़ में नेहा से आगे थी — रात को सीढ़ियों से फिसल गई और उसकी टाँग में फ़्रैक्चर हो गया। तीन महीने का बेड रेस्ट। बड़ा क्लाइंट प्रोजेक्ट अब नेहा को सौंपा गया।
नेहा को बुरा लगा, पर उसने ख़ुद को समझाया — संयोग है। प्रोजेक्ट अच्छा गया। बॉस ख़ुश हुए।
कुछ दिन बाद उसकी स्कूटी ख़राब हो गई। झुंझलाकर उसने गुड़िया से कहा, “काश कोई नई गाड़ी होती।” हफ़्ते भर में उसकी एक दूर की बुआ ने अपनी पुरानी कार उसे दे दी — “हमें अब ज़रूरत नहीं।” उसी हफ़्ते बुआ के बेटे की नौकरी चली गई और उसे बसों में धक्के खाने पड़े।
नेहा अब डरने लगी थी। उसने गुड़िया को अलमारी में बंद कर दिया। पर हर सुबह वह फिर टेबल पर बैठी मिलती — लैपटॉप के बगल में, बटन वाली आँखें दरवाज़े की ओर।
सिले हुए होंठ
एक रात नेहा की नींद किसी फुसफुसाहट से खुली। कमरे में अँधेरा था, सिर्फ़ खिड़की से सड़क की पीली रोशनी आ रही थी। आवाज़ टेबल की तरफ़ से आ रही थी — धीमी, खरखराती, जैसे कोई धागे से सिले मुँह से बोलने की कोशिश कर रहा हो।
“और… माँग… और…”
नेहा ने काँपते हाथों से लाइट जलाई। गुड़िया अपनी जगह थी। पर उसके लाल धागे का एक टाँका खुल गया था, और मुस्कान अब कान तक फैली थी।
अगले दिन फ़ोन आया — रितिका की हालत बिगड़ गई थी। फ़्रैक्चर में इन्फ़ेक्शन, आई.सी.यू.। नेहा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे वह बात याद आई — “यह कुछ बनाती नहीं, सिर्फ़ इधर से उधर करती है।” उसकी हर ख़ुशी किसी और की क़ीमत पर आई थी।
बाज़ार की तलाश
अगले मंगलवार नेहा गुड़िया को थैले में डालकर बाज़ार पहुँची। आख़िरी छोर पर, ख़राब स्ट्रीट लाइट के नीचे, वहाँ कोई दुकान नहीं थी। उसने सब्ज़ीवालों से पूछा, चूड़ीवाली से पूछा। किसी को कोई बूढ़ी औरत याद नहीं थी।
“वहाँ तो कोई दुकान लगती ही नहीं, मैडम,” एक फलवाले ने कहा, “वह जगह मनहूस है। बरसों पहले वहाँ एक बुढ़िया बैठती थी जो कहती थी कि वह टोना जानती है। लोग उससे जलन और बदले के लिए चीज़ें बनवाते थे। आख़िर में उसी के घर में आग लगी।”
थकी हुई नेहा उसी अँधेरे कोने में बैठ गई। थैले से गुड़िया निकाली। उसे फेंकना चाहती थी, जलाना चाहती थी — पर एक डर था कि अगर ऐसा किया, तो उसकी क़ीमत भी कोई और चुकाएगा।
तभी पीछे से वही आवाज़ आई — “लौटाने आई है, बिटिया?”
घूँघट वाली बूढ़ी औरत उसके पास बैठी थी। पर इस बार नेहा ने देखा, उसके घूँघट के नीचे चेहरा नहीं, बस धुएँ जैसी परछाईं थी।
“गुड़िया लौटती नहीं,” उसने कहा, “पर उसका सौदा उलटा जा सकता है। एक इच्छा कर — ऐसी जिसमें तू कुछ ले नहीं, सिर्फ़ दे। जो तूने लिया है, वह सब लौटाना होगा।”
आख़िरी इच्छा
नेहा ने गुड़िया को दोनों हाथों में लिया। उसका प्रमोशन, उसका नया पद, उसकी तनख़्वाह, वह कार — सब उसकी आँखों के सामने घूम गया। फिर उसे रितिका का चेहरा याद आया, आई.सी.यू. की मशीनों के बीच।
“मेरी इच्छा है,” उसने आँखें बंद करके कहा, “कि रितिका ठीक हो जाए, और बुआ के बेटे को उसकी नौकरी वापस मिले। मुझसे जो भी लेना है, ले ले।”
गुड़िया के सारे टाँके एक-एक करके खुलने लगे। लाल धागा हवा में उड़ा, बटन वाली आँखें ज़मीन पर गिरीं, और कपड़ा राख की तरह बिखर गया। जब नेहा ने आँखें खोलीं, उसके हाथ ख़ाली थे। बूढ़ी औरत जा चुकी थी।
अगले हफ़्ते रितिका आई.सी.यू. से बाहर आ गई। बुआ के बेटे को पुरानी कंपनी से दोबारा बुलावा आया। और नेहा का प्रमोशन “प्रशासनिक कारणों से” रोक दिया गया। कार की सर्विसिंग में इतना ख़र्च निकला कि उसने उसे बेच दिया।
पर नेहा को कोई अफ़सोस नहीं था। छह महीने बाद, जब रितिका ऑफ़िस लौटी, दोनों ने मिलकर एक नया प्रोजेक्ट लिया — और उसकी कामयाबी पर अगले साल दोनों का प्रमोशन हुआ। अपनी मेहनत से।
नेहा अब भी मंगल बाज़ार जाती है। पर आख़िरी छोर की ओर, जहाँ स्ट्रीट लाइट ख़राब है, वह कभी नहीं देखती। कुछ सौदे पचास रुपये के होते हैं, पर उनकी क़ीमत कोई और चुकाता है।
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नोट: यह कहानी काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गई है। इसके पात्र और घटनाएँ किसी वास्तविक व्यक्ति या स्थान से संबंधित नहीं हैं।



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